Thursday, November 1, 2007

दिवाली के बहाने




आठ दिन बाद ही दिवाली है, पता नहीं नज़र धुंधली हो गई है या कान कमज़ोर हो गए वैसी रौनक नहीं दिख रही जिसे देखने की बचपन से आदत है या फिर शायद दिल्ली के शोर और भीड़ में बचपन का वो मासूम उत्साह कहीं खो गया हैजेबखर्च का एक-एक पैसा बचाकर पटाखों का बजट बढ़ाना, घर की सफाई मे ज़बर्दस्ती ज़िद करके दीदी, भैया और मां के साथ शामिल होनाघरौंदा बनाने के लिए गत्ते, रंगीन काग़ज़ गोंद और दूसरी चीजों का इंतज़ाम करना भैया से कहके मैं उसमें बिजली की वायरिंग भी करवातावैसे मेरे घर में बहुत पहले से घरौंदा बनाने का दायित्य छोटका भैया(मझले भैया को मैं इसी नाम से बुलाता हूं) उठाते थेपहले मिट्टी के गारे और इंटो से और बाद में गत्ते और रंगीन कागज सेउनके बनाए घरौंदे का एक्सक्लूसिव गुण था कि उसमें बिजली की वायरिंग भी होती थीपूरे मोहल्ले में हमारा घरौंदा सबसे अच्छा होताभैया को घरौंदा बनाने का इतना शौक था कि जब भी किसी अच्छे घर का डिज़ाइन देखते उसे याद कर लेते और फिर दिवाली के घरौंदे में उस डिजाइन का इस्तेमाल करतेमोहल्ले और इलाक़े के अनुभवी लोगों के साथ बाबुजी भी तब भैया में भविष्य का इंजीनियर देखते थेहालांकि घरौंदा बनने के दौरान कई बार अनाधिकार छेड़छाड़ रने पर भैया का थप्पड़ खाकर मेरा उत्साह आंसूओं में बह जाता लेकिन जल्दी ही मां के आंचल की गरमाहट इस पिघले उत्साह को वापस दिल में लौटा देतीघरौंदा देखने पूरा मोहल्ला जमा होता और दिवाली बाद के कुछ दिनों तक सबसे बढ़िया घरौंदा बनाने वाले के छोटे भाई होने के गर्वातिरेक में मैं मगन रहता
भैया जब हाईस्कूल के बाद पढ़ाई करने मुजफ्फरपुर चले गए तब भी ये सिलसिला बना रहा वो दिवाली से पहले घर जाते और फिर घरौंदो की तैयारी शुरू हो जातीस्कूल जाने से पहले और लौट के आने के बाद कई हफ्ते तक मैं दिवाली के अलावा और कुछ सोचता ही थाखेलना, दोस्तों से मिलना सबकुछ कम हो जाता या फिर बंद उनसे मिलने पर बात होती तो घरौंदे की। हर दिन घरौंदे को धीरे धीरे करके आकार लेते हुए देखना किसी आर्किटेक्ट के पूरे होते सपने जैसा होता और हमारी खुशी भी घरौंदे की तरह बढ़ती रहती१९९० में छोटका भैया समय पर घर नहीं सके शायद परीक्षाओं के कारण और तब घरौंदा बनाने की कमान मेरे कंधो पर आईपहली बार जब घरौंदा बना रहा था तब बाबूजी ने पूछा तुम्हारे घरौंदे का बजट कितना है मैंने हिसाब लगाकर बताया तीस रूपयेइसके बाद उन्होंने इसके लिए अपनी तरफ से रुपये के अनुदान की घोषणा की मेरी खुशी के तो कहने ही क्या ? पचास पैसा देते तो साथ में सोच समझकर खर्च करने की हिदायत भी और वही बाबूजी पांच रुपये देने का एलान कर रहे थे मेरे लिए ये बड़ी उपलब्धि थीपूरे उत्साह से घरौंदा बनाना शुरू किया किसी तरह बाकी तो सबकुछ हो गया लेकिन बिजली की वायरिंग आती नहीं थी तो भैया की मदद मांगी और फिर घरौंदा तैयार हुआघर के आसपास हरियाली तैयार करने के लिए लकड़ी के बुरादे को हरे रंग में रंग देते हम लोगतब घर में साइकिल भी नहीं थी लेकिन घरौंदे के पोर्च में खड़ी करने के लिए खिलौना वाली अंपाला और मारूती कार जरूर थी, एक एंबेसडर भी थी जिसे हम घरौंदे के बगल में या फिर पिछवाड़े में खड़ी करते ये अहसास शायद तब भी था कि अब ये कार पुरानी हो चुकी है, कागज का बना टीवी और प्लास्टिक का फ्रिज भी थामेहमानों के लिए सोफे और बढ़िया सा अंग्रेजी स्टाइल वाला टी-सेट भी था जिसमें चाय की केतली के साथ दूध और चीनी के लिए अलग प्याली होती थीउस समय तक हमने ऐसे टी सेट खिलौनौं और फिल्मों में ही देखे थे आजकल बॉस के केबिन में देखते हैंछत पर लगा लकड़ी के सींक का बना एंटेना हमारे सपनों जैसे उंचा था और घरौंदा हमारे सपनों की तामीरये सारे खिलौने हम बड़ी जतन से सालों भर संभाल कर रखते और सिर्फ दिवाली के समय बाहर निकालते सच तो ये है कि वो खिलौने नहीं हमारे सपने थेघरौंदा जो हर साल हमारे आंगन में बनता और दिलों में सपने जगाता
आज
जिंदगी की हक़ीकत ने
इस सपने को आगर पूरी तरह से तोड़ा नहीं तो छोटा ज़रूर किया हैलेकिन तकलीफ इस बात की नहीं बल्कि इस बात की है कि वो घरौंदे कही खो गए हैं पांच साल पहले दिवाली मे घर गया था लेकिन ना तो मेरे घर में ना ही किसी औऱ घर में घरौंदा नज़र आयासपने तो बिखरे ही सपना दिखाने वाले घरौंदे भी गायब हो गएदिवाली के दिन बहने इसी घरौंदे में मिट्टी के खिलौने वाले बर्तनों में खील-बताशे भर कर पूजा करतींबाद में ये खील बताशे भाइयों को खाने के लिए मिलतेबताशे की मिठास भाई बहन के रिश्तों में घुलती। जारी...
निखिल रंजन





स्वयंवर के मेले में...2



बहरहाल, ताबीज पहनने की मेरी ज़िद के बाद हम मय गाड़ी दूरदर्शन अहमदाबाद पहुंचे। यह कहने में मुझे कोईगुरेज़ नहीं कि डीडी के इस केंद्र की स्थिति दूसरे रीज़नल न्यूज़ यूनिट के मुकाबले बेहतर है। मेरे कहने का गर्ज ये कि कैंटीन के खानें में मुझे काकरोच नहीं दिखे। खाने से बास भी नहीं आ रही थी। मुझे निराशा हुई। अहमदाबाद डीडी के गेस्ट हाउस में बहुत झिझकते हुए मुझे एक कमरा दे दिया गया। कमरा कोई खास तरह से साफ़ नहीं था। बरसात का मौसम था यह साफ दिख रहा था क्योंकि कमरे को खोलते ही कई मेंढक मेरी तरफ लपके।
खैर काफी जद्दोजहद करने के बाद मुझे तरनेतर- जो कि ज़िला सुरेंद्रनगर में है. राजकोट के पास- भेजने के लिए इंतज़ामात किए गए। उनका कहना था कि हमने इसे स्थानीय स्तर पर सन १९९४ में खूब कवर किया था और अब इसे दोबारा २००७ में कवर करने का कोई औचित्य नहीं। पर मेरे गुणसूत्रों का दोष.. मैंने फिर ज़िद पकड़ ली। कि यह सवरेज तो मुझे करनी बही है। मैं अपने बास से वादा कर आया था। एक नई तरह की रिपोर्टर्स डायरी देने का।
गाड़ी मिली। ड्राइवर भी। वही जिसने मेरे ताबीज पर बवाल काटा था। एक कैमरा-कम-लाइटिंग असिटेंट। एक साउंड तकनीशियन। और हां... एक उनींदा कैमरामैन .. जो सारी राह मुझे इस बेकार की मगजमारी में न पड़ने की सलाह देता रहा। धूप सीधे चेहरे पर पड़ती रही। शाम के वक्त हम तरनेतर पहुंचे। शानदार सड़क। चौड़ी। हरियाली..गो कि बरसात का मौसम था। लेकिन पेड़ ज़्यादा बड़े नहीं। नाटे। सीधे मेले की जगह पर पहुंचे। मेले की जगह में सुगबुगाहट शुरु हो चुकी थी। चरखियां लगने लगीं थी। दुकानों के लिए बल्लियां लगाई जा रही थी। लोग बाग एक खास तरह की गाड़ी छकड़े से आ जा रहे थे। आगे से मोटरसाइकिल, पीछे से उसमें तांगा जोड़ दिया जाए तो क्या गाड़ी बनेगी.. वही। एक गाडी में पचीस-सत्ताइस लोग। उस भीड़ में घुस कर पिसते हुए सफर करने का लुत्फ ही क्या है।

मेले की जगह पर ज़्यादा कुछ नहीं थी। हमें पीने का भी नहीं मिला। जो भी था खारा। लेकिन लोग बड़े मीठे थे। बाहर से आया जानकर और अधिक मदद करते। दुकानें भी देखी। हर जगह मौदी के कट-आउट। बड़ी होर्डिंग्ज़। मोदीमय गुजरात। कहीं गांधी नहीं। मन बुझ गया।

Tuesday, September 25, 2007

स्वयंवर के मेले में...




दोस्तों को शिकायत रही कि भगजोगनी की चमक बहुत दिनों से दिखाई नहीं दे रही... क्या करूं.. पेट की खातिर दर-दर भटकना हमारी नियति है। है कि नहीं.. वैसे नियति से कोई शिकायत भी नही। हमारी मजबूरी का हम बहुत संजीदगी से लुत्फ़ ले रहे हैं।

एक कवरेज के सिलसिले में गुजरात जाना पड़ गया। तरनेतर। ये अहमदाबाद से तरकीबन ,सवा दो सौ किलोमीटर दूर है। राजकोट की तरफ। जाने की बात हवा में उछली तो एक साथ ही खुशी भी हुई और बेचैनी भी। कहां जा रहा हूं मैं... गांधी के गुजरात या मोदी के ? बहरहाल, अहमादाबाद में हमारे दूरदर्शन के ड्राइवर ने मेऱा बहुत स्वागत किया। अच्छा लगा कि यहां मेज़बानी की शानदार परंपरा है। अहमदाबाद स्टेशन से दफ़्तर की ओर जाते वक्त शैलेश ने वे दुकानें दिखाईं, जिन्हें मोदीत्व के रखवालों ने मटियामेट कर दिया था। उसकी आवाज़ में पता नहीं क्यों.. एक अजीब-सी हैरान करने वाली खनक थी। मोदी का गुजरात गांधी के गुजरात पर हावी था।

उसी दिन यानी तेरह सितंबर को हम .. यानी कैमरा टीम तरनेतर के लिए निकल पड़े। रास्ता शानदार था। शानदार इसलिए क्योंकि सड़क समतल थी। गड्ढे नहीं थे। हमें हमेशा लगता है कि भारत के देहातों में सड़कें बेहद खराब हैं। लगना बेहद स्वाभाविक है। दरभंगा से उधर जयनगर की तरफ जाने वाले मेरे बिहारी मित्र मुझसे इत्तफाक रखेंगे कि कैसे ५५ किलोमीटर की दूरी को छह सात घंटे में पूरा किया जाता है।

अस्तु, गणेश चतुर्थी के दिन से तरनेतर का यह मेला शुरु होता है। गुजरात के हर रंग को यहां देख सकते हैं आप। टीम के साथ यहां आने वाला हमारा ड्राइवर बदल गया था। मेरे गले का ताबीज उसे पेरशान करता रहा। मेरे लाख समझाने पर भी कि यह ताबीज मेरी मां का पहनाया है इसका इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं , उसे कत्तई यकीन नहीं हुआ? .....
जारी...

Wednesday, July 4, 2007

सिनेमा पागल हाथी हो गया है...


सिनेमा भारतीय जीवन का जरूरी हिस्सा बना हुआ है। रोटी जैसा जरूरी। छुट्टी का वक़्त हो, या परिवार में उत्सव का, फ़िल्में वहां मौजूद रहती हैं। टेलिविज़न की पहुंच बेडरुम तक है। लेकिन वह सोने वालों की नींद पर डाका डाल सके, इसके लिए उसके पास सिनेमा ही हथियार है। टीवी पर आज सिनेमा पर आधारित कार्यक्रम सबसे ज़्यादा होते हैं। यह हिस्सा बढ़ेगा, अगर न्यूज़ चैनलों पर मीकाओं-राखी सावंतों, शाहिद-करीनाओं, और शिल्पा-गेरों के प्रसंगों को भी शामिल कर लें। अभिषेक और ऐश्वर्य के विवाह जैसे ब्रेकिंग न्यूज़ तो ख़ैर हैं ही।

अख़बारों में भी सिनेमाई ख़बरों के लिए अलग से सप्लीमेंट होता है, जो चाय की प्याली के साथ गरमा-गरम गॅसिप परोसता है। (तस्वीरों पर कोई टिप्पणी नहीं- सखेद)। लब्बोलुआब यह कि यह कि हम अपने निजी और सामाजिक जीवन की भी सिनेमा के बग़ैर कल्पना करें तो वह श्वेत-श्याम ही दिखेगा।

आपने कभी सोचा है कि क्या आपकी कोई मौलिक कल्पना शेष बची भी है? क्या सपने आपके अपने हैं? अख़बारों में विज्ञापन से शुरु हुई सुबह रात में किसी चैनल के मूवी मसाला या ख़बरें बालिवुड की पर ख़त्म होती हैं। वह भी तब जब आप बेहद शरीफ क़िस्म के इंसान हों, वरना इस समापन को बहुत दूर तलक ले जाने की ढेर सारी संभावनाएं मौजूद हैं।

फ़िल्मों को लेकर भारत में इतना दीवानापन है, फरि भी शबाना आज़मी को क्यों कहना पड़ता है कि भारत में सिनेमा देखने का संस्कार नहीं है? ज़ाहिर है, शबाना की इस शिकायत को प्रेमचंद के इस कथन से जोड़ा जा सकता है जहां उन्होंने कहा है कि इसे यानी सिनेमा को कोरा व्यवसाय बना कर हमने उसे कला के ऊंचे आसन से खींचकर ताड़ी या शराब की दुकान तक पहुंचा दिया है। प्रेमचंद को १९३६ में लगा था कि अधनंगी तस्वीरों और नाचों से जनता को लूटना आसान नहीं है। लेकिन, २००७ आते-आते आम जनता की समझ की जड़ में इतना मट्ठा डाला गया कि प्रेमचंद की पीढ़ी का सपना पृष्ठभूमि में चला गया है। उसे वाद का जामा पहना कर दरकिनार कर दिया गया है।

अगर एनडीटीवी के प्रबुद्ध पत्रकार रवीश कुमार सरीखे लोग उस दर्शक की तलाश में हैं, जो विदर्भ के शापित किसानों की जगह की कमर देखना चाहता है, तो इसके पीछ कई वजहें हैं। अव्वल बात तो ये कि दर्शकों की पसंद वास्तव में बदल गई है। वर्षों पहले महावीर प्रसाद द्विवेदी ने बुरे साहित्य की लोकप्रियता के संदर्भ में कहा था कि मक्खियां गुड़ पर नहीं बहते व्रण पर ज़्यादा बैठती हैं। यह कथन आज भी सिनेमा और टीवी कार्यक्रमों के बारे में उतना ही सच है। वरना क्या वजह है कि शकीरा ख़बर हैं. आधे घंटे या ज़्यादा का मसाला है, जिसे तानने की जुगत में हमारे अगुआ चैनल भिड़ जाते हैं? वहीं विदर्भ और तेलंगाना की समस्याएँ एकाध ज़िम्मेदार चैनलों पर ही जगह पा सकती हैं। दूसरी बात यह कि दर्शक अगर ब्लू फ़िल्म देखना चाहें तो क्या हम उसे भी परोस दें?

सिनेमा पर लिखना कभी भी अच्छा और गंभीर काम नहीं माना गया। सिनेमा पर प्रेस या जनता का बौद्धिक अंकुश कभी नहीं रहा। सिनेमा ख़ासकर हिन्दी सिनेमा पर जितनी लेखकीय और पत्रकारीय नज़र रहनी चाहिए थी, उसका एक फ़ीसद भी नहीं रहा। नतीजतन यह पागल हाथी हो गया। फिर उस पर अंकुश लगाने की ज़िम्मेदारी एक ऐसी एजेंसी के हाथों में है, जो सरकारी है, और सरकारी एजेंसियों की गंभीरता और नीतिगत तेज़ी का तो सबको पता है। अख़बारों ने भी सिनेमा का इस्तेमाल किया। उसी तरह किया, जैसे आजकल के टीवी चैनल कर रहे हैं। वरना क्या वजह है कि सिनेमा के नाम पर आधे घंटे का विशेष चलाने वाले चैनल या चार पेज़ का सप्लीमेंट छापने वाले अख़ाबार सत्यजित या ऋत्विक घटक या श्यानम बेनेगल पर ९० सेकेंड की स्टोरी या दो कालम की खबर नहीं छाप सकते?

सिनेमा भारतीय सांस्कृतिक लोकाचारों को उसकी ही ज़मीन से बेदखल करता जा रहा है। यह हमारे लोक-व्यवहार को नियंत्रित करने लगा है। पहनावे और बोलचाल की भाषा पर फिल्मों का असर तो सब महसूस कर रहे हैं। साथ ही, यह हमारी देहभाषा तय करने लगा है। वैले यह भी सच है कि समाज की सारी विकृतियों की जड़ सिनेमा ही नहीं है। पर अगर इस तर्क के समांतर सोचें कि समाज का ही अक्स सिनेमा में दिखता है, तो समाज पर पड़ने वाले सिनेमाई प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है.। सो, अगर फ़िल्म खलनायक के प्रतिनायक संजय दत्त और डर के शाहरुख़ ख़ान दर्शकों की सहानुभूति बटोरने कामयाब होते हैं, तो इसे सामाजिक चिंता का विषय माना जाना चाहिए। माचिस और फ़ना बेशक संवेदनशील फ़िल्में हैं। लेकिन आखिरकार ये देशविरोधी आतंकवादियों को ही महिमामंडित करती हैं। फिर ऐसी भी फ़िल्में हैं, जिनमें माफिया सरगनाओं के जीवनचरित को दिखाया गया है। और इसमें उन्हें लार्जर दैन लाइफ चित्रित किया गया है। यह सिलसिला गैंगस्टर तक आगे भी कायम है। जिसमें माफिया सरगना की प्रेमिका पुलिस इंस्पेक्टर नायक की हत्या कर देती है। दर्शक उसके इस सत्कर्म पर तालियां बजाता हुआ हाल छोड़ता है। दर्शकों की मनोवृति में आया यह बदलाव संस्कृत नाटकों के साधारणीकरण की प्रक्रिया के रिवर्स गियर में जाने और निचले दर्जे की रसानुभूति का उदाहरण है। रामचंद्र शुक्ल के मुताबिक, निचले दर्जे की रसानुभूति वह स्थिति है, जिसमें दर्शकों की सहानुभूति और तादात्म्य बुरे पात्रों के साथ हो जाती है।

बहरहाल, सामाजिक मूल्यों मे और -बुरे को पारिभाषित करने के इस अराजक माहौल में ज़िम्मेदारी तय करना आसान नहीं है। लेकिन यह तर्क सिनेमा को नंगा नाच करने की छूट नहीं दे देता। बाज़ार के चौराहे पर खड़ा सिनेमा पटरी वाले दुकान सरीखा है, जो जब तक मुनाफे में रहेगा तभी तक चल सकेगा। निर्देशक भी तभी तक सफल है, जब तक वह निर्माता को कमा कर दे सके।

ऐसे में बहुत खुले दिल से सोचें तो भी सेरोगेट विज्ञापन से लेकर मसालेदार आइटम नंबर तक , स्तुत्य तो नहीं लेकिन क्षम्य ज़रूर हो सकते हैं। कोई बेनेगल, निहलाणी या घोष पागल हो रह इस हाथी पर अंकुश लगाने की कोशिश तो करता है, लेकिन मुख्यधारा में नहीं। मुख्यधारा के तो मणिरत्नम को भी जवाब है। और नैतिकता.... बालिवुड में यह अनचीन्हा शब्द है।

मंजीत ठाकुर

Monday, May 14, 2007

धान पर ध्यान


चीन मे एक कहावत है- दुनिया की सबसे बेशकीमती चीज़ हीरे-जवाहरात और मोती नहीं, धान के पांच दाने हैंयह कहावत तब भी सच थी, जब बनी होगी और आज भी उतनी ही सच हैशायद इसीलिए पश्चिमी दुनिया जहां भेड़ों, सू्अरों, कुत्तों और इंसानों की क्लोनिंग पर ध्यान दे रहा हैवहीं भूख से जूझ रहे एशिया में धान के जीनोम की कड़ियां खोजी जा रही हैंनेचर पत्रिका में तो कुछ महीने पहले धान के जीनोमिक सीक्वेंस को छापा भी गया है

एशिया समेत दुनिया के बड़े हिस्से में तीन अरब लोगों का मुख्य भोजन चावल हैलेकिन इस फसल से भोजन पाने वाली आबादी का ज़्यादातर हिस्सा अभी भी भूखा ही हैदुनिया भर में ८० करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं और करीब ५० लोख लोगों की मौत कुपोषण की वजह से हो जाती हैआंकड़ो का और भी भयावह बनाता है यह तथ्य कि दुनिया की आबादी में हर साल रोड़ ६० लाख लोग जुड़ जाते हैंइस तेज़ी से बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए अगले २० साल में चावल की उपज को ३० फ़ीसदी तक बढ़ाना होगालाख टके का सवाल है कि यह चावल कहां और कैसे पैदा होगा?

आमतोर पर उपज बढ़ाने के दो तरीके सर्वस्वीकृत हैंपहला, खेती के लिए ज़मीन को बढ़ाना या फिर पैदावार में बढ़ोत्तरी करनासाठ के दशक के पहले, पहले वाले विकल्प को ज्यादा आसान मानकर उसी पर अमल किया गयापरिणाम सबके सामने हैहमने विश्वभर में बहुमूल्य जंगलों की कटाई कर उनमें खाद्यान्न बो दिए और प्रदूषण और पारिस्थितिक असंतुलन को न्यौता दियालेकिन साठ के दशक में नॉर्मन बारलॉग जैसे वैज्ञानिकों ने स्थिति को नाजुकता को समझकर दूसरे विकल्प यानी पैदावार बढ़ाने के लिए बीजों की गुणवत्ता सुधार और तकनीकी साधनों की ओर ध्यान दियाउस प्रयास का परिणाम निकला हरित क्रांति के रूप मेंजैसे ही पौधों की नई किस्मे पहले मेक्सिको और फिर पूरे विश्व में बोई जाने लगी फसल उत्पादन में भारी बढ़तोत्तरी हुईख़ासकर एशिया में यह वृद्धि की दर फीसदी सालाना के आसपास रही
हरित क्रांति के सफर में कुछ पड़ाव भी आएपिछले कुछ वर्षों में उत्पादन में वृद्धि की दर मामूली रही, तो यह सोच लिया गया कि चावल उत्पादन अब अपने चरम पर पहुंच चुका है और इसमें अधिक विकास की अब संभावना नहीं बचीऐसे में सीमांत भूमियों उत्पादन बढ़ाना एक बड़ी चुनौती रही है, जहां अधिकतर फसलें कीटों के प्रकोप, रोगों या सूखे की वजह से कत्म हो जाती है
कई वैज्ञानिक मानते हैं किदुनिया के सबसे गरीब व्यक्ति तक खाना पहुंचान का उपाय जीन अभियांत्रिकी से सुधारी गई फसलें ही हो सकती हैंये फसलें प्राकृतिक आपदाओंका सामा करने में अधिक सक्षम हौजीएम फसलों की क्षमता तब एक बार फिर उजागर हुईजीएम फसलों की क्षमता तब एक बार फिर उजागर हुई एक चीनी अध्ययन में कीट प्रतिरोधी जीएम चावल की किस्म में दस फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज़ की गई? यह सिर्फ उत्पादन बढ़ाने का ही मामला नहीं है, बल्कि यह कीटनाशकों के अत्यधिक हो रहे प्रयोग को नियत्रित करने में भी सहायक होगाचीन में ऐसे कीट प्रतिरोधी क़िस्में उगाने वाले किसानोें में कीटनाशकों से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं में नाटकीय सुधार देखा गया है
लेकिन हरित क्रांति की राह में पड़ाव भी आएवैसे तो, १९८३ से ही चावल के बी संकर बीज उपलब्ध थे, लेकिन १९८७ में हरित क्रांति के दूसरे चरण से शुरूआत बड़े स्तर पर की गईइसमें 'अधिक चावल उपजाओ' कार्यक्रम को प्रधानता दी गईइस द्वितीय चरण में १४ राज्यों के १६९ ज़िलों का चुनाव किया गयासंकर बीजों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए १६९ में से १०८ ज़िलों में चावल क्रांति को प्राथमिकता दी गईदरअसल, इनमें हरियाणा के और पंजाब के ज़िले भी शामिल हैं, जिन्हें परंपरागत तौर पर गेहूं उत्पादक माना जाता थाअन्य प्रमुख राज्यों में से मध्यप्रदेश(छत्तीसगढ़ सहित) के ३० उत्तरप्रदेश-उत्तरांचल के ३८, बिहार के १८, राजस्थान के १४ और महाराष्ट्र के १२ ज़िले
दूसरे चरण की हरित क्रांति का ही परिणाम है कि भारत आज खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हैखाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) खाद्यान्न दान करने दूसरा सबसे बड़ा संगठन हैचवाल के जीनोम की सिक्वेंसिंग इंटरनेशनल राइस जीनोम सिक्वेंसिंग प्रोजेक्ट ने की हैइसका डाटाबेस भारत समेत जापान, चीन ताईवान, कोरिया, थाईलैंड, अमेरिका, कना़डा, फ्रांस, ब्राजील, ब्रिटेन और फिलीपीन्स के वैज्ञानिकों के लिए निशुल्क उपलब्ध हैज़ाहिर है, यहां भूमंडलीकरण के सकारात्मक पहलू सामने आए हैं
दुनिया में करीब १२० करोड़ लोग रोजाना एक डॉलर से भी कम पर गुजारा करते हैऐसे में , रोग, पे्स्ट, सूखा और लवणता प्रतिरोधी धान की फसल तीसरी दुनिया के कृषि परिदृश्य में क्रांति ला सकती है जाहिर है, यह भूखों के हित में होगा
मंजीत ठाकुर